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संसद की अनदेखी की नई परंपरा

Posted On: 13 Jul, 2013 Others में

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संसदीय शासन व्यवस्था का आधार स्तंभ विधायिका और उसके द्वारा प्रतिपादित संविधान ही होता है। किसी भी लोकतंत्र में संसद का महत्व सबसे ज्यादा होता है। निर्वाचित सरकार संसद के प्रति ही जबावदेह होती है। भारतीय संविधान की आत्मा भी लोकतंत्र के मंदिर संसद में ही बसती है लेकिन देश में चल रहे राजनीतिक पतन के मौजूदा दौर में सरकारें संसद और विधानसभाओं का महत्व कम करने की मुहिम में जुटी है। कांग्रेस नीत यूपीए सरकार ने सस्ता अनाज योजना को लागू करने के लिए खाद्य सुरक्षा अध्यादेश जारी करने का अप्रत्याशित विकल्प चुना जबकि महज दो सप्ताह बाद ही संसद का मानसून सत्र शुरू होना है।
कांग्रेस संसद में विधेयक लाने के बजाय अध्यादेश का विकल्प चुनने के लिए जो तर्क दे रही है वो भी काफी हास्यापद है। कांग्रेस का तर्क है कि विधेयक संसद में लाने और उस पर चर्चा में काफी वक्त लगता है और इससे योजना को लागू करने में देरी होती है। कांग्रेस कह रही है कि किसी अच्छे कार्यक्रम को लागू करने के लिए संसद की मंजूरी का इंतजार करने के कारण देरी क्यों की जाए? क्या कांग्रेस यह कहना चाहती है कि संविधान, संसद और शासन उसकी मु_ी में हैं और जैसा वो चाहेगी वैसा ही होगा।
संसद का घटता महत्व
इसमें कोई दो राय नहीं कि संसद का महत्व बदल गया है। संसद का महत्व अब चर्चा के बजाय संख्या पर निर्भर होने लगा है। सत्तालोलुपता, राजनीतिक अहं और सियासी जोड़-तोड़ के मौजूदा दौर में इस मुद्दे पर बहस बेमानी है कि संसद सत्र से ऐन पहले सरकार का अध्यादेश लाना का निर्णय उचित है अथवा नहीं? क्या देश की मौजूदा स्थिति और राजनीतिक समीकरण को देखते हुए सिर्फ अध्यादेश के जरिए ही कानून बन सकता है? क्या यह लोकतंत्र और संसद का उपहास नहीं है?
दरअसल, हमारे राजनीतिक दल विरोधात्मक राजनीति को इतना दूर तक ले गए हैं कि किसी मुद्दे पर चर्चा और बहस की गुंजाइश ही नहीं बचती है। संसदीय परंपराओं में गिरावट का मौजूदा दौर ही जारी रहा तो वह दिन भी दूर नहीं जब संसद और आम लोगोंं के महत्व पर गहरी चर्चा का महत्व ही हमारे लोकतंत्र से विलुप्त हो जाएगा।
पंद्रहवीं लोकसभा में ३७० विधेयक पेश किए जाने हैं लेकिन अब तक सिर्फ १७२ विधेयक ही अब तक पेश हो पाए हैं। इनमें से सौ से भी कम विधेयक पारित हुए और उनमें से भी कई विधेयक तो बिना चर्चा के ही पारित हो गए तो कुछ पर चर्चा की रस्म अदायगी ही मात्र हो पाई। चौदहवीं लोकसभा का २५ फीसदी वक्त हंगामे और कार्यवाही स्थगन की भेंट चढ़ा था और मौजूदा लोकसभा में भी यह परंपरा जारी है। मौजूदा लोकसभा का करीब ३० फीसदी वक्त बर्बाद हो चुका है। पहले के दौर में सांसद हंगामे अथवा स्थगन के कारण नष्ट होने वाले वक्त की भरपाई और विधायी कार्य निपटाने के लिए अतिरिक्त समय तक काम करते थे लेकिन अब यह परंपरा खत्म हो चुकी है। अब तो सरकार और विपक्ष के बीच किसी मुद्दे पर तकरार के कारण सत्र का तय समय से पहले ही सत्रावसान कर दिया जाता है। लोकसभा की हर मिनट की कार्यवाही संचालन पर करीब ढाई लाख रुपए खर्च होता है।
बराबर की जिम्मेदारी
संसद का मुख्य काम है कानून बनाना। कानून बनाने की इस प्रक्रिया मेंं सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों की बराबर की जिम्मेदारी होती है। इसलिए संसद की कार्यवाही बाधित होने और कानून बनाने की प्रक्रिया में रूकावट आने के लिए भी दोनों ही बराबर के जिम्मेदार हैं। सत्तारूढ़ कांग्रेस हो अथवा मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा या अन्य कोई पार्टी, मीडिया में बयानबाजी के अलावा किसी भी पक्ष ने हाल के दिनों में संसद में किसी भी ज्वलंत मुद्दे पर चर्चा में दिलचस्पी नहीं दिखाई। सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच मतभेद कोई नहीं बात नहीं है लेकिन आज के दौर में दोनों पक्षों के अडिय़ल रूख के कारण राजनीतिक दलों के असहमति अब संवादहीनता का कारण बन गई है।
तकरार की राजनीति
हाल के समय में एक नई परंपरा बनी है। विपक्ष संसद का सत्र शुरू होने के पहले ही दिन किसी मसले को प्रधानमंत्री अथवा उनके किसी मंत्रिमंडलीय सहयोगी के इस्तीफे की मांग करता है और सत्तारूढ़ पार्टी इससे इनकार करती है। सहयोगी दलों का धु्रवीकरण भी पक्ष-विपक्ष में हो जाता है। विपक्ष के हंगामे के कारण या तो सदन की कार्यवाही स्थगित हो जाती है या विपक्षी सदस्यों के बहिर्गमन के बाद विधायी कामकाज निपटाने की रस्म अदायगी की जाती है। दोनों पक्षों की इसी तकरार में पूरा सत्र खत्म हो जाता है और दोनों पक्ष फूले नहीं समाते। साथ ही संसद नहीं चल पाने का दोष दूसरे पर थोपते हुए घडिय़ाली आंसू भी बहा लेते हैं। बहिर्गमन से जहां सत्तारूढ़ कांग्रेस को सदन में किसी असहज स्थिति का सामना किए बिना ही कामकाज निपटाने में मदद मिल जाती है वहीं मुख्य विपक्षी पार्टी भाजपा को मीडिया की सुर्खियों में आने का मौका मिल जाता है।
कुल मिलाकर सत्ता पक्ष और विपक्ष ने ऐसी स्थिति बना दी है जिसमें वे एक-दूसरे पर लांछन लगाकर बेदाग निकल जाते हैं और बेचारी जनता ठगी जाती है। लेकिन सरकार को इससे खुली छूट मिल जाती है मनमाफिक कानून बनाने की। आखिर हजारों करोड़ रुपए जिस योजना पर खर्च होना है उस पर संसद में चर्चा क्यों जरुरी नहीं है? खाद्य अध्यादेश के लिए सरकार शीतकालीन सत्र में कामकाज नहीं होने के तर्क का ही सहारा ले रही है यानी सरकार ने इसे अपने लिए कवच बना लिया। यह कोई पहला मौका नहीं है जब सरकार ने ऐसा किया।
अध्यादेश का औचित्य
चाहे विशिष्ट पहचान पत्र का मामला हो या एंटी रेप कानून अथवा खाद्य सुरक्षा गारंटी का, केंद्र सरकार ने संसद की अनदेखी कर पिछले दरवाजे से अस्थायी कानून बनाने का विकल्प ही चुना। लोकतंत्र के लिए इसे बेहतर संकेत नहीं कहा जा सकता है। लेकिन विडंबना यह है कि इससे बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी एक फैसले में कहा था कि अध्यादेश के सहारे सरकार (वास्तविक रूप में कार्यपालिका) विधायिका की कानून बनाने की शक्ति को कम करने की कोशिश नहीं कर सकती। २० दिसम्बर १९८७ को तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश पी एन भगवती ने एक फैसले (डॉ डी सी वधवा व अन्य बनाम बिहार राज्य व अन्य, एआईआर ५७९,१९८७) में कहा था कि सरकार को अध्यादेश प्रख्यापित कर किसी असाधारण परिस्थिति से निपटने के लिए कानून बनाने का हक है लेकिन इसे राजनीतिक उद्देश्य के लिए विकृत करने की इजाजत नहीं दी जा सकती। किसी भी अध्यादेश को छह महीने में संसद से मंजूरी नहीं मिलने पर स्वत: निष्प्रभावी हो जाता है। सरकार खाद्य सुरक्षा अध्यादेश को मानसून सत्र में पारित करवाएगी और यह उसके लिए विधेयक लाने की तुलना में सियासी तौर पर आसान भी होगा। संभव है कि सरकार भविष्य में विवादास्पद भूमि अधिग्रहण विधेयक सहित अन्य कानूनों को लागू करने के लिए भी अध्यादेश का रास्ता ही चुने।
वक्त रहते चेंतें
स्वस्थ्य व परिपक्व लोकतंत्र में विचारों में असहमति व मतभेद आवश्यक हैं। अलग-अलग तरह के विचारों के प्रकटीकरण से ही सटीक निर्णय हो सकता है। देश की सबसे बड़ी पंचायत में जहां सदस्य अलग-अलग क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करते हैं, उन्हें किसी मसले पर अपने विचार रखने का अवसर नहीं मिलेगा तो सही कानून कैसे बनेगा। लिहाजा, सभी पक्षों के नेताओं को इस पर समय रहते विचार करना चाहिए, नहीं तो संसदीय लोकतंत्र की अवाधारणा ही खतरे में पड़ जाएगी।



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